बागेश्वर। जिले में सावित्रीबाई फुले की जयंती श्रद्धा, सम्मान और गंभीर वैचारिक मंथन के साथ मनाई गई। जिला एससी-एसटी शिक्षक एसोसिएशन बागेश्वर के नेतृत्व में आयोजित विचार गोष्ठी में शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, युवाओं और नागरिकों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। कार्यक्रम की शुरुआत सावित्रीबाई फुले के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनके विचारों के स्मरण से हुई। वक्ताओं ने सावित्रीबाई फुले के अतुलनीय शैक्षिक योगदान और सामाजिक संघर्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि वे भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, जिन्होंने विरोध, अपमान और कठिन परिस्थितियों के बावजूद बालिकाओं और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया। गांव-गांव जाकर शिक्षा की अलख जगाना उनके जीवन का संकल्प था।
जिला एससी-एसटी शिक्षक एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष सुनील कुमार धौनी ने सावित्रीबाई फुले के सामाजिक कुरीतियों, जातिगत भेदभाव और महिला उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उनका जीवन आज भी समाज को दिशा देने वाला है। एसोसिएशन के संरक्षक हरीश आगरी ने महात्मा ज्योतिबा फुले के विचारों को रेखांकित करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय, समानता और मानवता की सेवा उनके दर्शन का केंद्र है, जिसे आज के संदर्भ में अपनाना अनिवार्य है। कार्यक्रम में शिक्षिका प्रियंका प्रीत ने बालिका शिक्षा को सशक्त समाज की नींव बताते हुए शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया।
पूर्व कुमाऊं मंडल महामंत्री डा. संजय कुमार टम्टा ने सावित्रीबाई फुले के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर गहन विचार रखते हुए प्रश्न उठाया—क्या संघर्ष वास्तव में समाप्त हो गया है? उन्होंने कहा कि विद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, परंतु वह शिक्षा, जो सवाल करना और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना सिखाती है, आज भी संकट में है। उन्होंने कहा शिक्षा को केवल रोजगार और अंकों तक सीमित रखने से सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं। सावित्रीबाई का सपना चेतना की शिक्षा था, जिसे पुनर्स्थापित करना होगा। आज पत्थर नहीं फेंके जाते, लेकिन ‘मर्यादा’ के नाम पर स्त्री की स्वतंत्रता पर जो पहरे हैं, वे उसी विरोध का आधुनिक रूप हैं। महिला सशक्तिकरण तब तक अधूरा है, जब तक दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक महिलाओं के अनुभवों को नीति निर्माण के केंद्र में नहीं रखा जाता। अवैतनिक घरेलू श्रम का बोझ महिलाओं की प्रगति में बड़ी बाधा है। घर के भीतर न्यायपूर्ण श्रम विभाजन के बिना सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी संभव नहीं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सावित्रीबाई फुले को याद करना केवल माल्यार्पण नहीं, बल्कि उन अधूरे सवालों से जूझना है जो आज भी हमारे लोकतंत्र के सामने खड़े हैं। जब तक शिक्षा वास्तव में सबके लिए समान नहीं होगी और स्त्री के सपनों पर ‘मर्यादा’ के पहरे रहेंगे, तब तक सावित्रीबाई का संघर्ष जारी रहेगा।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों को समानता, परिश्रम और आत्मसम्मान के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया गया। इस अवसर पर युवा पत्रकार लता प्रसाद को उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए सम्मानित किया गया। साथ ही प्रियंका प्रीत, सहायक अध्यापिका राउमावि मलसूना, तथा अनीता आगरी को अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मान प्रदान किया गया। कार्यक्रम का संचालन ब्लॉक अध्यक्ष नवीन त्रिकोटी ने किया। अंत में उपस्थितजनों ने सावित्रीबाई फुले के विचारों को जीवन में उतारने और समाज में शिक्षा व समानता का संदेश फैलाने का संकल्प लिया। इस अवसर पर गिरीश चंद्र धौनी, कोषाध्यक्ष गोविंद प्रसाद आगरी, मीडिया प्रभारी भूवन चंद्र आर्या, कमलेश कुमार, दिव्य प्रकाश, मोहन चंद्र, ब्लॉक अध्यक्ष कपकोट रवि प्रकाश, प्रेम चंद्र, डा. कमलेश कृष्ण सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

