बागेश्वर: जिले में पहली बार बेहद दुर्लभ हिमालयी पक्षी चीर फीसेंट के दो जोड़े देखे जाने से वन्यजीव प्रेमियों और पक्षी विशेषज्ञों में उत्साह है। माना जा रहा है कि जिले में इस संकटग्रस्त पक्षी की मौजूदगी का यह पहला रिकॉर्ड हो सकता है। चीर फीसेंट, जिसे कई क्षेत्रों में चीर तीतर भी कहा जाता है, हिमालयी इलाकों में पाया जाने वाला एक बेहद सुंदर लेकिन दुर्लभ पक्षी है। यह भारत के सबसे संकटग्रस्त पर्वतीय पक्षियों में गिना जाता है। इसकी लंबी पूंछ, धूसर-भूरे पंख और तेज आवाज इसकी खास पहचान हैं। करीब 90 से 120 सेंटीमीटर लंबाई वाले इस पक्षी की पूंछ काफी लंबी होती है। इसके शरीर पर हल्के भूरे और ग्रे रंग का मिश्रण दिखाई देता है, जबकि गर्दन और शरीर पर काली-सफेद धारियां इसे अलग पहचान देती हैं। नर और मादा लगभग एक जैसे दिखते हैं। यह पक्षी कम उड़ान भरता है और ज्यादातर जमीन पर दौड़ता या पहाड़ी ढलानों पर चलता नजर आता है। चीर फीसेंट मुख्यत ऊंचे हिमालयी घास के ढलानों, झाड़ियों वाले खुले जंगलों, चीड़ के जंगलों के आसपास और पत्थरीली पहाड़ियों में पाया जाता है। इसे शांत और कम मानव हस्तक्षेप वाले इलाके पसंद हैं। आमतौर पर यह 1500 से 3000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में देखा जाता है।उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में अब तक इसकी मौजूदगी पंगोट, रानीखेत, मानिला, मुनस्यारी और सातताल जैसे सीमित क्षेत्रों में दर्ज की गई है। ऐसे में बागेश्वर में इसका दिखाई देना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वन्यजीव फोटोग्राफर एवं पक्षी विशेषज्ञ हिमांशु तिरुवा ने बताया कि बागेश्वर में चीर फीसेंट का फ्लॉक मिलना बेहद खुशी की बात है। इससे साफ संकेत मिलता है कि जिले का प्राकृतिक वातावरण और आबोहवा इन दुर्लभ पक्षियों के लिए अनुकूल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस पक्षी के संरक्षण और इसके आवास को सुरक्षित रखने पर ध्यान दिया जाए तो आने वाले समय में बागेश्वर पक्षी पर्यटन के क्षेत्र में नई पहचान बना सकता है।
