सांतू-आठू कुमाऊं का अनोखा लोकपर्व, गौरा-महेश के मिलन की है खास परंपरा

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उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में मनाया जाने वाला सांतू-आठू यानी सातूं-आठूँ लोकपर्व लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था और पारिवारिक रिश्तों की अनूठी परंपरा का प्रतीक है। कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों में तीन दिवसीय इस पर्व की शुरुआत हो गई है। भाद्रपद मास की सप्तमी और अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व में महिलाएं माता गौरा और भगवान शिव की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

सांतू-आठू पर्व की तैयारियां पंचमी तिथि से ही शुरू हो जाती हैं। इस दिन बिरुड़ भिगोने की परंपरा निभाई जाती है। गहत, मक्का, गेहूं, कल्यूं सहित पांच प्रकार के अनाज को एक पात्र में भिगोकर बिरुड़ तैयार किए जाते हैं। पर्व में इन बिरुड़ों का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। घरों में महिलाएं पारंपरिक तरीके से पूजा की तैयारियां करती हैं और पर्व से जुड़ी लोक परंपराओं को निभाती हैं।

लोकमान्यता के अनुसार सप्तमी के दिन माता गौरा अपने ससुराल से रूठकर मायके आती हैं। अष्टमी के दिन भगवान शिव यानी महेश्वर उन्हें मनाने और वापस ससुराल ले जाने के लिए आते हैं। इसी वजह से इस पर्व में गौरा को बहन या दीदी और भगवान शिव को जीजाजी के रूप में मानकर पूजा करने की विशेष परंपरा है। महिलाएं व्रत रखती हैं और गौरा-महेश से परिवार की खुशहाली, सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।

पर्व के दौरान घर-आंगन में लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है। महिलाएं सामूहिक रूप से झोड़ा-चांचरी और पारंपरिक लोकगीत गाकर गौरा-महेश का गुणगान करती हैं। इससे गांवों और कस्बों में लोकसंस्कृति का रंग दिखाई देता है। पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भाई-बहन, मायके और ससुराल के रिश्तों की भावनात्मक डोर को भी मजबूत करता है।

तीन दिवसीय आयोजन के समापन पर गौरा-महेश की प्रतिमाओं और बिरुड़ का विधि-विधान के साथ विसर्जन किया जाता है। कई स्थानों पर इन्हें मंदिर या प्राकृतिक जलस्रोत में विसर्जित करने की परंपरा है। इस तरह सांतू-आठू पर्व कुमाऊं की समृद्ध लोकपरंपरा, पारिवारिक भावनाओं और धार्मिक आस्था को एक साथ जोड़ने वाला अनोखा लोकपर्व है।

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