गरुड़ में मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0‌ की बैठक, 30 से अधिक रेशम किसानों ने लिया हिस्सा

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बागेश्वर। केंद्रीय रेशम बोर्ड के राष्ट्रीय वृहद् रेशम प्रौद्योगिकी हस्तांतरण अभियान मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0 के तहत मंगलवार को गरुड़ में जिला स्तरीय हितधारक परामर्श बैठक आयोजित की गई। बैठक का मुख्य उद्देश्य रेशम किसानों तक उन्नत उत्पादन तकनीकों और विभागीय योजनाओं की जानकारी पहुंचाना, उनकी क्षेत्रीय समस्याओं को समझना और वैज्ञानिकों व विभागीय अधिकारियों के साथ सीधे संवाद के माध्यम से रेशम उत्पादन बढ़ाने की कार्ययोजना तैयार करना रहा। कार्यक्रम में 30 से अधिक रेशम किसानों ने भाग लिया।

बैठक में पर्यावरणविद् किशन सिंह मलड़ा, क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र सहसपुर देहरादून के वैज्ञानिक-डी डॉ. पवन सैनी, पी-3 मूल बीज फार्म माजरा देहरादून के वैज्ञानिक-सी डॉ. विक्रम कुमार, गरुड़ की सहायक विकास अधिकारी मनीषा, जिला रेशम निरीक्षक ब्रजेश रतूड़ी और रेशम फार्म गरुड़ की प्रभारी डॉ. स्नेहा जोशी मौजूद रहीं।

वैज्ञानिक तकनीक अपनाने पर जोर

डॉ. विक्रम कुमार ने किसानों से संवाद करते हुए रेशमकीट पालन से जुड़ी तकनीकी जानकारी साझा की। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण रेशमकीट बीज के इस्तेमाल, वैज्ञानिक तरीके से पालन, उचित तापमान और आर्द्रता बनाए रखने तथा पालन गृह के नियमित विसंक्रमण पर विशेष जोर दिया। उन्होंने बताया कि रेशमकीट पालन में छोटी-छोटी सावधानियां बरतकर स्वस्थ कीट और बेहतर गुणवत्ता वाले कोकून प्राप्त किए जा सकते हैं। किसानों ने पालन के दौरान आने वाली व्यावहारिक समस्याएं भी वैज्ञानिकों के सामने रखीं, जिनके समाधान के लिए तकनीकी सुझाव दिए गए।

डॉ. पवन सैनी ने मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0 अभियान के उद्देश्य और महत्व की जानकारी दी। उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक एवं उन्नत तकनीकों को अपनाने, शहतूत के बागानों का बेहतर प्रबंधन करने और रेशमकीट पालन की क्षमता बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कोकून उत्पादन और उत्पादकता बढ़ने से किसानों की आय में भी वृद्धि हो सकती है। वैज्ञानिक संस्थानों, राज्य रेशम विभाग और किसानों के बीच बेहतर समन्वय को उन्होंने रेशम उद्योग के विकास के लिए जरूरी बताया।

मूंगा रेशम उत्पादन अपनाने का सुझाव

पर्यावरणविद् किशन सिंह मलड़ा ने पर्वतीय क्षेत्रों में रेशम उत्पादन की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों को शहतूती रेशम के साथ मूगा रेशम उत्पादन की संभावनाओं पर भी काम करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक और जैविक संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर रेशम उत्पादन में विविधता लाई जा सकती है। इससे किसानों के लिए अतिरिक्त आजीविका और आय के अवसर पैदा हो सकते हैं।

बैठक में शहतूत पौधरोपण, बागान प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण पत्ती उत्पादन, रेशमकीट पालन, रोग एवं कीट प्रबंधन, पालन गृह के विसंक्रमण, कोकून उत्पादन और विपणन से जुड़ी समस्याओं पर भी विस्तार से चर्चा हुई। विभागीय अधिकारियों ने किसानों को उपलब्ध संसाधनों और सरकारी सहयोग का अधिकतम लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया।

बैठक से किसानों और वैज्ञानिकों के बीच सीधा संवाद स्थापित हुआ। किसानों से मिले सुझावों और क्षेत्रीय आवश्यकताओं को बागेश्वर जिले में रेशम उत्पादन को मजबूत करने के लिए जिला स्तरीय कार्ययोजना तैयार करने में उपयोग किया जाएगा। कार्यक्रम को जिले में टिकाऊ, उत्पादक और लाभकारी रेशम उद्योग को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया गया।

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